दिवा स्वप्न
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दिवा स्वप्न ( प्रसिद्ध संस्कृत कहानी का कविता रूपांतर)

P P SharmaP P Sharma October 6, 2022
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एक भिखारी था लाता
हर दिन भिक्षा माँग
खा पीकर जो बचता
देता था छींके पर टांग ।

कितने ही दिन हो गए
जब ऐसा करते करते
छिंके पर का घड़ा भी
भर गया भरते भरते ।

एक दिवस वह भिक्षुक
घड़ के नीचे डाले खाट
लगा सोचने घड़ा देख
अब तो होंगे मेरे ठाट ।

इन्हें बेचकर चंद मुर्गियाँ
मैं लेकर आऊंगा
उनसे अंडे और अंडों से
मैं ढेरों मुर्गे पाऊंगा ।

बेच सभी मुर्गे मुर्गी को
ले आऊंगा बकरी
फिर बकरी से बकरों की
जब संख्या होगी तगड़ी ।

उन्हें बेचकर गाएँ फिर
गायों को बेच के घोड़ी
इस प्रकार धन धान्य की
लग जाएगी जब ढेरी ।

चार कमरों का इक मकान
अपना मैं बनवाऊंगा
किसी धनी की बेटी को
तब व्याह यहाँ लाऊंगा ।

फिर एक लड़का होगा
मैं खेलूंगा उसके साथ
पत्नी लगी काम में होगी
अपनी व्यस्तता के साथ ।

बच्चा रोएगा और पत्नी
जब ना दे पाएगी ध्यान 
एक लात जोर से उसे
दूँगा  मैं पीछे  से तान ।

ऐसा सोच चलाया उसने
बड़ जोर से लात
फूटा छिंके का घड़ा
और हुई आवाज फटाक ।

इसके संग् ही टूट गया
दिवा स्वप्न भी उसका
सिर्फ सोचने से मनोरथ
पूर्ण हुआ है किसका ?

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