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प्रेम को परिभाषित 
नही किया जा सकता,
इसलिए लिखी जाती
 रही है कविताएं,
कविताएं समझने के 
लिए नही होती,
कविताओं को जीया जाता है,
जिसे कवि 
जी कर लिखता है,
और पढ़ने वाले 
पढ़ते हुए जीते है,
केवल पढ़ कर ना प्रेम 
समझा जा सकता है
ना कविताएं ।
-वीर

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