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सब के ज़ख्मों पर मरहम लगाए न गए

Nivedan KumarNivedan Kumar March 31, 2022
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सब के ज़ख्मों पर मरहम लगाए न गए

घर जो उजड़े इक बार बसाए न गए


वस्ल के किस्से सुनाते फिरते हैं सब

हिज्र के किस्से किसी से भी सुनाए न गए


ख़ुदा करता है परेशान अच्छे लोगों को

बुरे लोग ख़ुदा से भी सताए न गए


हकीक़त क्या है जमीं की वो क्या जाने

जो लोग बुलंदी से गिराए न गए


मिले खरीदार कई राह-ए-ज़िंदगी में मगर

हम वो कीमत जो किसी से भी चुकाए न गए


भूख निगल जाएगी खा जाएगी महंगाई

खर्च के पैसे अगर रोज़ कमाए न गए


झूठ कहते हैं क्या खाक हुए हैं बेहतर

पुराने रिश्ते अगर हम से निभाए न गए


खत्म हो जाएगी ये दुनिया लड़ते-लड़ते

जंग के शोले अगर जल्द बुझाए न गए

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