पहचान- ख़ुद बनाते हैं's image
Poetry1 min read

पहचान- ख़ुद बनाते हैं

Nivedan KumarNivedan Kumar September 1, 2022
Share0 Bookmarks 184 Reads0 Likes

लोग आते हैं लोग जाते हैं

अपनी पहचान ख़ुद बनाते हैं


चांद सूरज की शह पे रोशन है

हम हैं जुगनू ख़ुद जगमगाते हैं


कुछ चले ही नहीं गिरने के डर से बैठ गए

चलने वाले ही मेरे दोस्त लड़खड़ाते हैं


किसी का कुछ भी नहीं है यही हक

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts