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पहचान- ख़ुद बनाते हैं

Nivedan KumarNivedan Kumar September 1, 2022
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लोग आते हैं लोग जाते हैं

अपनी पहचान ख़ुद बनाते हैं


चांद सूरज की शह पे रोशन है

हम हैं जुगनू ख़ुद जगमगाते हैं


कुछ चले ही नहीं गिरने के डर से बैठ गए

चलने वाले ही मेरे दोस्त लड़खड़ाते हैं


किसी का कुछ भी नहीं है यही हक़ीक़त है

जाने किस बात पर फ़िर लोग इतराते हैं


जब कभी ख़ुद पर गुमान होता है

ख़ुद को ख़ुद आईना दिखाते हैं


साथ जब काफ़िला तो डरना क्या

एक नया रास्ता बनाते हैं


कितने कमजोर लोग होते हैं

मुश्किलों से जो भाग जाते हैं

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