लोकतंत्र's image
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हम केवल महदूद नहीं हैं

राजमहल तक मीनारों तक

पहुंच हमारी चौखट तक है

घर-घर तक हर दीवारों तक


विकसित होने का दावा

हम करते हैं सारी दुनिया से

मंदिर.मस्जिद और मजहब को

ले आए हम बाजारों तक

जनता के अधिकार की बातें

संविधान तक ही सीमित हैं

सुनहरे सपने सियासी दावे

सिमटे हैं केवल नारों तक


भुख,बीमारी और लाचारी

सब है जनता के हिस्से में

राजनीति की पहुँच है केवल

सत्ता सुख और गुल हारों तक


झूठ का महिमामंडन होता

और सत्ता की जय जयकार

सच की पहुँच नहीं है लेकिन

कलमकार तक अखबारों तक


जनता पहुंच नहीं पाई है

अभी विकास के पैमानों तक

लेकिन नारे आ पहुंचे हैं

गली गली तक दीवारों तक


लाख करोड़ों अरबों खरबों

योजनाओं को दिए जा चुके

आम आदमी पहुंचा है बस

आश्वासन तक आभारों तक


हाथ सने हैं राजनीति के

शोषण के वंचन के खून से

आलोचक ने निंदा की है

कवि पहुँचे हैं धिक्कारों तक


संयम का गुण त्याग दिया है

वर्तमान की राजनीति ने

जन गण मन अब आ पहुंचा है

असंसदीय व्यवहारों तक

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