आना-जाना's image
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शाम आना है सुब्ह जाना है

ज़िंदगी का कोई ठिकाना है


वक़्त ने ये हुनर सिखाया है

दर्द औ ग़म में मुस्कुराना है


बच के चलिए फरेबी लोगों से

कहीं नज़रें कहीं निशाना है


सब की बारी आएगी एक दिन

वक़्त ने सब को आज़माना है


सच का दौर गुज़र गया कब का

आजकल झूठ का ज़माना है


हुनर ने तय किया है सोचा है

मुश्किलों को सबक सिखाना है


मशवरा कीजिए बुजुर्गों से

तजुर्बा दरअसल ख़ज़ाना है


खुशी से दोस्ती बिल्कुल नयी है

ग़म से ताल्लुक बहुत पुराना है

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