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पवन चली है होले हौले, महकी कलियाँ भवरे झूले

मंद मंद सी भीनी खुशबू, पुरवा के संग उपवन डोले

इठला कर चलती है सरसों, सरसर सरसर गेहूँ बोले

देखो बदली भी है छाई, अपने संग सावन को लाई

लौट के आई चिड़िया रानी, खाने को दाना भी लाई

कुकु करती कोयल चहके, मोर नाचते नदिया ठहके

मौसम हुआ सुहाना प्यारा, चमक उठा नभमंडल सारा

कहाँ छुपा है तू मतवाले, इनके संग संग तू भी होले

नज़र उठा कर देख सवार, लदे हुए है वृक्ष अपार,

चिंतित होकर क्या पाएगा, तृष्णा में ही जल जाएगा

ऊँचे स्वर में गाकर गीत, चंचल होजा मन भयभीत।।


नितिन शर्मा।

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