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पुरुष तुम गेहूँ, वो गुलाब

Nitin Kr HaritNitin Kr Harit March 14, 2022
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- पुरुष तुम गेहूँ, वो गुलाब -


बीच पगडंडी पर खड़ा था मैं,

एक तरफ तन कर खड़ा था गेहूँ,

एक तरफ लहरा रहा था गुलाब...


यूं तो दोनों में अपने-अपने गुण थे,

पर ना जाने क्यों?

घमंड से इतरा रहा था गेहूँ.

नुकीली सी कर रखी थीं उसने बालें अपनी,

जैसे कह रहा हो, दुनिया का पेठ भरता हूँ,

मुझ जैसा कोई नहीं,

मैं तैयार हूँ, हर चुनोती के लिए...


वहीं गुलाब, महक रहा था

लहलहा रहा था

खुले दिल से, 

बिना भेद भाव के 

बाँट रहा था अपना मकरंद

हवा में घोल रहा था ख़ुशबू

पानी को तराश कर बना रहा था गुलाब जल

उसने अपने हर पंखुड़ी दान कर दी थी

ताकि उनसे बन सके इत्र, शर्बत

और ना जाने क्या क्या...


मैं खुश था, बेहद खुश

देखकर गुलाब का ऐसा समर्पण

पर इतने में गेहूँ बोल पड़ा

अभी बहुत पीछे हो तुम गुलाब,

बताओ, 

क्या भर सकते हो किसी का पेठ ?

मेरी तरह...


गुलाब जलने लगा,

प्रतिस्पर्धा की आँच में

उसने नहीं पूछा गेहूँ से

क्या महक सकते हो तुम

बना सकते हो इत्र...

लुटा सकते हो मकरंद?

बस उसने ठान लिया, गेहूँ हो जाना!

बालों के जैसे उगा लिए

अपनी देह पर नुकीले काँटे

जो भेदने लगे उसकी ही पंखुड़ियां...

गुलाब, अब नहीं रहा गुलाब

गुलाब, अभी नहीं बना था गेहूँ...


ये पगडण्डी किसी खेत की नहीं थी

ये थी समाज की पगडण्डी

जहाँ एक तरफ पुरुष खड़ा था, तनकर, गेहूँ सा

दूसरी तरफ जल रही थी 

गेहूँ होने की चाह में गुलाब सी स्त्री..!


- नितिन कुमार हरित #nitinkrharit 


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