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कृष्ण ही जाने मन की माया

Nitin Kr HaritNitin Kr Harit November 14, 2022
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"मन ही गाये, मन ही झूमे, मन ही हंसे और मन ही रोय,

आठों पहर ये दौड़े भागे, ये ना थके और ये ना सोय,

मन के संबंधों पर समझ ले, मन का पूरा पहरा होय,

तन की जाने हैं बहुतेरे, मन की जाने कोय कोय।


ये ना दिखे पर सबको देखे, मन ने कैसा खेल रचाया,

सौ सौ तन से युद्ध करे जो, एक मन के आगे घबराया,

लाख जतन कर कर के हारा, मन को लेकिन जीत ना पाया"

"जान हरित इस भ्रम के जग में, सबसे भयावह मन की माया"


"हे केशव, इतना बतलाओ, मैं, मन दोनों भिन्न भला क्यों?

मेरे मन ने, मेरा होकर, मुझको ही दिन रात छला क्यों?

भ्रम के जग में, भ्रम की काया, काया में भ्रम घोर पला क्यों?

जिस पथ पे निश्चित है भटकना, उस पथ पे संसार चला क्यों?"


"मन चंचल है, रथ का चालक, तू है तेरे रथ का स्वामी,

मन केवल एक दास समझ ले, तुझ में तू, मैं अंतर्यामी,

तू साधक सर्वज्ञ समर्थ है, मन अल्पज्ञ भ्रमित खल कामी,

तुझको नहीं है असाध्य यहां कुछ, इंद्रियां सब जो हुईं सदगामी"


- नितिन कुमार हरित #NitinKrHarit

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