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गीतासार | श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद | २ | आत्म ज्ञान

Nitin Kr HaritNitin Kr Harit January 15, 2023
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आत्म ये अर्जुन, ओढ़ के चोला, भ्रम की देह का, जग में आए,

तन की रचना, मन की श्रेणी, प्रारब्धों के फल से पाए,

देह क्षणिक है, पल पल बदले, बाल्य, युवा, जर्जरता लाय,

इसको केवल सत्य बताकर, चंचल मन सबको भरमाए।


रोग इसी के, शोक इसी का, जग में इसी के रिश्ते नाते,

जग में जग का छूटे सारा, नाते अर्जुन साथ ना जाते,

आत्म अमर है, अविनाशी है, ज्ञानी जन ना शोक मनाते,

जल से ना भीगे, सूखे जले ना, आत्म के पुष्प ये कब मुरझाते?


अस्त्र ना कोई शस्त्र ना कोई, मार सके जो वध कर डाले,

बेड़ी ना कोई बांध सके जो, रोक सके जो ऐसे ना ताले,

रूप ना कोई रंग ना कोई तन में तन का रूप बना ले,

तन की अवस्था जब हो पूरी, छोड़ चले कर जग के हवाले।


मृत्य जगत में मृत्यु अटल है, तू मारे ना मारे अर्जुन,

कर्म के संग खड़ा ना होकर, सारे काम बिगाड़े अर्जुन,

माया सबको काल भुला दे, किसको कौन पुकारे अर्जुन,

तेरे ही कितने परिजन पूर्वज अबतक स्वर्ग सिधारे अर्जुन।


~ नितिन कुमार हरित #NitinKrHarit

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