एक चिड़िया थी's image
2 min read

एक चिड़िया थी

Nitin Kr HaritNitin Kr Harit October 31, 2021
0 Bookmarks 53 Reads0 Likes
फूलों से कुछ खाब चोंच में अपनी भर कर लाती थी,
एक चिड़िया थी, रोज़ सवेरे मेरे घर में आती थी।
सूरज से पहले आकार ही मुझको रोज़ जगाती थी,
एक चिड़िया थी रोज़ सवेरे मेरे घर में आती थी।

बहुत पुरानी बात हुई ये, जब मैं छोटा बच्चा था,
खुला खुला घरबार था मेरा, और हां पूरा कच्चा था,
पर रिश्ता पक्का था उसका, सच में रोज़ निभाती थी,
एक चिड़िया थी रोज़ सवेरे मेरे घर में आती थी।

मैं मुंडेर पे दाना पानी उसको देकर आता था,
एक दाना भी वो खा ले तो कितना खुश हो जाता था,
वो फिर चीं चीं करके मुझको सारा हाल बताती थी,
एक चिड़िया थी रोज सवेरे मेरे घर में आती थी।

धीरे धीरे मैंने देखा जैसे हम सब बड़े हुए,
मन के अंदर इच्छाओं के कितने पर्वत खड़े हुए,
डाल वही काटी थी हमने जिस पर वो इठलाती थी,
एक चिड़िया थी रोज सवेरे मेरे घर में आती थी।

रिश्ते उसने खूब निभाए लेकिन हमने तोड़ दिए,
पक्के घर के पागलपन में उसके अंडे फोड़ दिए,
दर्द नहीं सुन पाए उसका, जो वो दर्द सुनाती थी,
एक चिड़िया थी रोज सवेरे मेरे घर में आती थी।

फिर एक दिन वो चोंच भी उसकी एक पत्थर से लाल हुई,
छोड़ गई निर्मम शरीर को, वो इतना बेहाल हुई,
बिखर गए सब खाब चोंच से, भर भर कर जो लाती थी।
एक चिड़िया थी रोज सवेरे मेरे घर में आती थी।

- नितिन कुमार हरित

#nitinkrharit #हरित_वाणी #शब्दोंकाघर

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts