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आओ एक दीपक जलाएं,

दीप वो जिसमें कहीं ना जातियों का भेद हो,

दीप वो जिसमें ना ही विश्वासघाती छेद हो,

दीप जो ऊंचे मकां में, ज्योति खो जाता ना हो,

बिन छतों के झोपड़ों को, जो जला आता ना हो,

दीप जो हंसता रहे, हर गम छुपा अपने तले,

चल जलाएं वो दिया, जो औरों की खातिर जले,

वो दिया जो मन के अंदर का अंधेरा मार दे,

नाव का मांझी बने, उस पार हमको तार दे,

रोशनी हो मन के भीतर, जगमगा जाएं दिशाएं,

आओ, एक दीपक जलाएं।


~ नितिन कुमार हरित

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