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अधखुले बाल

Nitin Kr HaritNitin Kr Harit January 10, 2022
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कांधों पे लटकते वो अधखुले से बाल,
आधे सूखे, आधे गीले,
कभी कभी सूरज के आगे चमकते हुए,
लरजते हुए, महकते हुए,
चुप भी कहां रहते थे,?
चुपचाप छेड़ते थे शरगोशी सी कोई,
मैंने तो कई बार सुनी है,
उनकी आवाज़,
उनकी आहटे...
जैसे हर बार मुझे ही पुकारा हो !

- नितिन कुमार हरित

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