अब तो उत्थान करो's image
OtherPoetry2 min read

अब तो उत्थान करो

Nitin Kr HaritNitin Kr Harit October 6, 2022
Share0 Bookmarks 77 Reads1 Likes

हे पार गगन के आवासी, अब तो कुछ ध्यान करो,

अब दुर्दिन है, अति विषम घड़ी, अब तो उत्थान करो।


अब प्रातःकाल घर घर आंगन, खगकुल के कलरव शब्द नहीं,

घर घर में श्वान, गौ गलियों में, उनके आँचल में दुग्ध नहीं,

अब मुरली में संगीत नहीं, अब कवि नहीं, रस छंद नहीं,

अब गुरु नहीं, अब शिष्य नहीं, अब वीणा में स्पंद नहीं ,

अब आस तुम्हीं पर अटकी है, श्रद्धा का मान करो,

अब दुर्दिन है अति विषम घड़ी अब तो उत्थान करो।


अब कहां रहे वो शंखनाद, अब घंट नहीं गुंजित होते,

अब सुमन सुरभि से वंचित है, मन दिखते नहीं मुदित होते,

अब प्रेम, शब्द तक सीमित है, अब सांसों में विश्वास नहीं,

इस निराधार जग में मोहन, अब इच्छा है, पर आस नहीं,

हे प्रभो, प्रभो तुम, उठ बैठो, पद का तो भान करो,

अब दुर्दिन है अति विषम घड़ी अब तो उत्थान करो।


तुम इस अवनि के सार गर्भ, ये अवनि सार तुम्हारी है,

ये व्याकुल तो तुम व्याकुल, किस कारण नाथ बिसारी है?

क्यों विमुख हुए दिनों के नाथ, किस कारण धीरज धरा हुआ?

क्या भूल गए है कांधों पर, तूणीर अभी तक भरा हुआ।

जो काल दंत को काट सके, एक सर संधान करो,

अब दुर्दिन है, अति विषम घड़ी, अब तो उत्थान करो,


हे पार गगन के आवासी, अब तो कुछ ध्यान करो,

अब दुर्दिन है, अति विषम घड़ी, अब तो उत्थान करो।


- नितिन कुमार हरित #NitinKrHarit

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts