मर्द लोग's image
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पीढ़ियों का बोझ उठाकर चलते रहे,

कोमल कंधे यूं ही नही दमदार हो गये।


सहते रहे धूप ताप बारिशों को,

जमाने से खेलकर कलाकार हो गये।


कहना सीख ना सके तो लिखने लगे ,

अपनी ख़ामोशियों के ये फनकार हो गये।


कलमकारी के ऐसे ये शिकार हो गये,

कभी निराला तो कभी गुलजार हो गये ।


दिन भर झुलसने से ये भठ्ठी बन गये,

रातों को लौटे चौखटों की रौशनी हो गये।


ये रंगों को भी खुल के सजा ना सके,

नीले, काले,सफेद रंगों में ही कैद हो गये।


क्या कहेगी दुनिया यही सोचते रह गये,

खुद के लिए ये मिठाईयां भी ना मंगा सके।


घर बनाते बनाते दीवार से हो गये,

जीने आये थे जिम्मेदार से हो गये ।


जिन्दा तो होते हैं पर जी नही पाये ,

जमाने में ऐसे कुछ लोग मर्द कहलाये।


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