खाक हैं हम !'s image
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ये महफिलें हैं रेेशम से लदे मख़सूस लोगों की ,

हम फटे कुर्ते में ही खुद को समेटने का हुनर जानते हैं। 


वो दूर जाके बैठते हैं जैसे पहचानते ही नहीं ,

मै खुदा को भी झुठला देता हूँ उनको कभी नहीं। 


वक्त का तजुर्बा भी कुछ हो चला है निशांत,

तुम्हे ही लगता था कुछ लोग बदलते कभी नहीं ।


यें दौलतें, शोहरतें, उल्फतें,कब्र तक जाता कुछ नहीं,

एक मुश्त खाक हैं हम उससे जियादा कुछ नहीं ।



 





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