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मुर्गे का घमंड

Nishant JainNishant Jain June 16, 2020
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मुर्गा बोला यूँ मुर्गी से

हूँ मैं सबसे हटकर,

जंगल सारा जाग उठे जब

देता बाँग मैं डटकर।

 

कलगी मेरी जग से सुंदर

चाल मेरी मस्तानी,

उड़ न सकूँ भले जीवन भर

हार कभी न मानी।

 

मुर्गी बोली फिर मुर्गे से

बस छोड़ो इतराना,

अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बन

अपनी - अपनी गाना।

 

करके देखो एक दिन ऐसा

मत देना तुम बाँग,

मानूँ तुम्हें मैं तीसमार खाँ

रुका रहे जो चाँद।

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