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कैसे वे रुक पाएँ?

Nishant JainNishant Jain June 16, 2020
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समय-समय पर साहसियों ने

तोड़े हैं दस्तूर,

जाने कैसे भरे हुए थे

दिमागों में फितूर।

 

पुर्तगाल का सनकी नाविक

छोड़ सभी आराम,

करके पार समंदर पहले

पहुँचा हिंदुस्तान।

 

कोलंबस का भी था प्यारे

कैसा अजब सलीका,

चला ढूँढ़ने भारत था पर

जा पहुँचा अमरीका।

 

कैप्टन कुक की बात निराली

थकने का क्या काम,

अटक-भटक पहुँचे ऑस्ट्रेलिया

कंगारू के धाम।

 

खुराफात भी क्या थी मन में

हिम्मत का क्या दम,

नई-नई राहों पर बढ़ना

हो सुख या हो गम।

 

तूफान-बवंडर-भँवर-आँधियाँ

हों कितनी बाधाएँ,

सचमुच हों धुन के जो पक्के

कैसे वे रुक पाएँ।

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