poem's image
Share0 Bookmarks 0 Reads0 Likes
लोकोक्तिक 
गान 

किस्मत 
  उलटी है या सीधी 
पता ना 
      रास्ता तो चल कर ही 
मालूम होगा 
 सरल या टेढ़ा 

दिन.निकला 
   सूरज उगा पूरब में 
  छिपेगा पश्चिम में 
 आये जो  
   उन्हें जाना भी है  

  साँस अंदर बाहर 
आवे जावे 
 करे टिटौली 
शरीर से 

  सारे जख्म दिल में 
मन 
नींद उनीद 
हंसी ख़ुशी 
में निर्लिप्त 

  मन नाचे नंगा नाच 
मिले तो भी 
न मिले तो भी 
एहि बड़ा 
निर्लज़्ज़  है 

  तेरी धुली चादर 
  मेरी मैली चादर से 
  गन्दी क्यों है  
  कवि फोरम  
  रचना 
     निरंजन गौतम दत्त

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts