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मानस की जात सबैएकै पहचानबौ भाग-1

Neeraj sharmaNeeraj sharma January 1, 2022
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मानस की जात सबैएकै पहचानबौ 
              धर्म-कब,क्यो और कैसे(भाग-1)
             
   (नीरज शर्मा-9211017509)                                 

            धर्म आस्तिक मानव के जीवन का एक प्रमुख अंग है। मानव जीवन में धर्म की महत्ता का इस बात से भी पता चलता है कि संपूर्ण विश्व में बहुत से महापुरुषों ने अपनी धार्मिक आस्था एवंम धार्मिक मान्यताओं का पालन करते रहने के लिए प्राणों तक की आहुति देने से भी पीछे नहीं हटे।हर वर्ष विश्व में धार्मिक कर्मकांड और परंपराओं को निभाने में मानव अरबों रुपए खर्च करता है।धर्म हमारी संस्कृति और रहन-सहन के ढंग को निश्चित करने में भी अति विशेष भूमिका निभाता है। धर्म मिश्रित रूप है जीवनयापन शैली, सदाचार, कर्तव्य, परम्परा, चरित्रनिर्माण,पाप, पुण्य,रिती-रिवाज,शिक्षा, विज्ञान, व्यवस्था, दण्ड, कर्म, वास्तु, न्याय, आचरण, खान-पान ,आचार संहिता, नियम, सिद्धान्त आदि जैसे अनगिनत कृत्यों एवंम आस्था, सकरात्मकता,विश्वास, क्षमा,दया, क्रूरता,खुशी, क्रोध, प्रसन्नता, जिगयासा, शान्ति आदि जैसी असंख्य भावनाओं और उस परमेश्वर जिस ने सृष्टि रची है उस को स्मरण करने की पद्धति ही धर्म है। प्रत्येक धर्म में परमात्मा को स्मरण करने का तरीका अलग अलग हो सकता है परन्तु पुर्णता सभी धर्मों में आत्मा का परमात्मा से मिलन ही है।                                                            धर्म पर वाद-विवाद इक आम सी बात है। परन्तु धर्म हमारे जीवन में कब और कैसे आया यह शोध का विषय है। हमें यह समझना होगा कि जीवन का आधार धर्म नही है अपितु धर्म का आधार जीवन आवश्य है। जैसे भाव का आधार भावना पर भावना का आधार भाव नही। धर्म के बिना पृथ्वी पर जीवन तो हो सकता है परन्तु जीवन के बिना धर्म का कोई अस्तित्व नही। कभी-कभी ऐसे महानुभावों से भेंट एवं धर्म पर चर्चा हो जाती है जिनके मत अनुसार मानवता ही उनका धर्म है।निश्चित रूप से मै भी यह मानता हुं कि प्रत्येक मानव मे मानवता के भाव होने ही   चाहिए परन्तु उन भावो को हम धर्म की संज्ञा नही दे सकते।धर्म तो वो है जिस के अनुसरण में लिऐ गऐ निर्णय से बहुजन मानस का कल्याण हो। इस लघु कथा मे दिऐ तथ्यों पर आप विचार करें और समझे कि मानवता एक भाव तो हो सकता है किन्तु धर्म नही। 

लघु कथा- 'एक राज्य में खूंखार लुटेरे अकसर उत्पात मचाते थे। लूट-पाट के साथ साथ सामान्य जनो की हत्या करने में उन्हें अति आनन्द की अनुभूति होती थी।उस राज्य के राजा की बहुत कोशिशों के वावजूद भी वह गिरफ्त में नही आते थे पर एक रात लुटेरो का प्रमुख राजा के सैनिकों के हत्थे चढ गया।राजा ने उसे सहस्त्र कोड़े मारने के बाद नगर के बाहर उसको मरने तक पेड से बांधने की सजा दी और राजा ने उस पेड़ पर राज आज्ञा पत्र भी चिपकाने को कहा जिस पर लुटेरे के अपराध एवं राजा द्वारा लिया गया निर्णय लिखा हो ताकि कोई व्यक्ति भी उसकी सहायता ना करे।राज आज्ञा का अनुसरण करते हुए सैनिकों ने कोड़े मारने के बाद लुटेरे को पेड से बांध दिया एवम् राज आज्ञा पत्र को पेड पर चिपका दिया और चले गए।कुछ समय बाद वहां पास ही के मार्ग से एक सेठ निकल रहा था जोकि मानवता को ही धर्म मानता था। उसने बेसुध बंधे लुटेरे को देखा एवंम राज आज्ञा को पढा परन्तु उसने राज आज्ञा को किनारे कर मानवता वादी भावनाओं से वशीभूत होकर लुटेरे को बन्धन मुक्त किया,उसको पानी पिलाया और उसके घावों पर औषधीय लेप लगाया।तब तक लुटेरे को भी सुध आ गई थी।उसकी नजर सेठ के पहने मोती-माणिक जडे कंठ हार एवं अंगुलियों मे पहनी स्वर्ण मुद्रिकाएं पर पडी। उसने मन ही मन भगवान को धन्यवाद दिया कि उसे सुध आते ही इतना अच्छा मौका दिया।उसने बिना समय व्यर्थ गंवाऐ सेठ को धर दबोचा और निकट ही पडे पत्थर से सेठ पर कई प्रहार कर के सेठ को मरा समझ,सेठ का सारा माल लूट के नगर की तरफ चला गया। उसने नगर में पहुंच कर फिर से बहुत सी हत्याऐ और लूट-पाट की।

 वहां पेड के पास सेठ बेसुध पड़ा था पर अभी तक सांस चल रही थी। वहां से गुजर रहे कुछ राहगीरों ने सेठ को वैद के पास ले गए।सेठ के द्वारा जीवन मे किये सत्कर्मो के पुण्य फल से प्राण बच गऐ। उधर राजा को नगर मे मचे उत्पात का पता चला। उसने तुरंत सभा बुलाई और सेठ द्वारा किए कार्य का उसे पता चला तो तुरंत सेठ को सभा मे बुलवाया।सेठ की हालत देख राजा को समझते देर नही लगी की यह सेठ द्वारा किये कार्य का ही कुपरिणाम है। राजा ने सेठ को डांटते हुए कहा कि क्या तुमने पेड पर लगी राज आज्ञा और निर्णय नही पढा था?सेठ बोला हां मैंने पढ़ा था पर मैं मानवता धर्म से मजबूर था। राजा ने कहा ऐसा कार्य धर्म कैसे हो सकता है जिसका अनुसरण करने से जनसाधारण के साथ लूट-पाट एवं हत्या जैसे अत्यंत घिनौने अपराध हों। धर्म के आधीन तो हर उस अपराधी के लिए सजा निश्चित है जो मानव जीवन एवं कानून-व्यवस्था के लिऐ खतरा हो। कुछ विशेष मामलों मे धर्मानुसार ऐसे व्यक्तती एवं जीव का वध भी धर्म ही है। तुमने जो कार्य धर्म समझ कर किया अंत में वही अधर्म बन गया। तुम्हें यह समझना होगा कि मानवता पूर्ण धर्म नही अपितु एक भावना मात्र है और उसमे भी उसकी सीमाएं है।सेठ को बात समझ आई और उसने राजा से क्षमायाचना की परन्तु राजा ने सेठ को उचित सजा सुनाकर कारागार मे भेज दिया'। मनुष्य को प्रमुखता से इस बात का बौद्ध होना चाहिए कि मानवता का आधार केवल दया भावना है और धर्म ऐसी अनगिनत भावनाओं का अथाह सागर है।     
             यहां एक बात उल्लेखनीय है कि मानव को पैदा होने से पहले और मरने के बाद धर्म की कोई आवश्यकता नही रहती।यानि मनुष्य को धर्म की आवश्यकता सिर्फ जीवन-मरण के चक्र के बीच तक ही रहती है।यानि जैसे मानव संसारिक वस्तुओं का भोग अपने पैदा होने के बाद और जीवित रहने तक‌‌ ही कर पाता है।कुछ ऐसा ही धर्म के साथ है।तो क्या मनुष्य धर्म को भी बाकी संसारिक वस्तुओं की ही तरह भोगता है?यानि मनुष्य अन्य सांसारिक बसतुओ कि तरह ही धर्म को भी अर्जित करता है या अपने माता-पिता से बिरासत मे पाता है।अब मुख्य प्रश्न यह है कि मानव को जीवन मे धर्म की आवश्यकता क्यों महसूस हुई।इस बात के कोई लिखित प्रमाण नही मिलते किअसल मे धर्म जीवन मे कब आया।इस विषय के कई लेख एवं पुस्तके पढ़ने के बाद और इतिहास के कुछ विद्वानो से हुई चर्चा के अन्त मे जो परिणाम निकल के सामने आऐ वो पाठको के समक्ष प्रस्तुत करता हूं। पृथ्वी पर मानव जीवन के आरंभ के पश्चात कालान्तर में जैसे जैसे मनुष्य की बुद्धि और जनसंख्या मे बढ़ोतरी हुई। मनुष्य की नवीनतम भोजन एव कदं मूल की तलाश में रूचि एवं नया उपयुक्त रुचि अनुकुल वातावरण की तलाश ने उन्हें धरती के अलग अलग भागों में स्थापित किया। वहीं रह कर उनकी जनसंख्या मे वृद्धि हुई। एक प्रमुख बात यहां लिखना चाहूंगा कि ज्यादातर जीवों मे अपने बच्चों के लिऐ कुदरती तौर पर मोह और लगाव की भावना होती है।इस तरह की भावनाएं और मोह जीव को कोई सिखाता या पढ़ाता नही है।यह भावनाएं तो लगभग हर जीव अपने जन्म के साथ अपने स्वभाव मे लेकर ही पैदा होता है।ऐसी भावनाओं को आप आज भी प्रत्यक्ष रूप मे जंगली जीवों तक में देख सकते है। जिनकी जीवनशैली आज भी लगभग वैसी ही है जैसी प्राचीन समय में थी।उन जीवो में भी अपनी औलाद के लिए सुरक्षा एवंम मोह की भावना आप देख सकते हैं।अब फिर से मूल लेख पर आता हूं। जैसे जैसे मनुष्य की जनसंख्या बढ़ने लगी तो उन्होंने मोह और सुरक्षा की  भावना के अधीन परिवार और संगठन में रहने की रूचि बढ़ने लगी। जिस के फल स्वरूप मानव जीवन  में संयुक्त परिवार सभ्यता ने जन्म लिया। परिवार एवंम संगठन आगे चल के ढ़ाणियों मे तब्दील हुऐ और आगे चल कर यही ढ़ाणिया गांवों के रूप मे विकसित हुई।जब मानव संगठित हो कर रहने लगे तो अब उन्हें एक दूसरे से सवांद की इच्छा और अपने लोगों को किसी खतरनाक जानवर अथवा आपदा से सावधान करने के लिए किसी माध्यम की जरूरत महसूस हुई।तब धीरे धीरे सांकेतिक भाषा और ध्वनि संकेतों की शुरुआत हुई। धीरे धीरे समय के विकास के साथ इन भाषाओं का भी विकास हुआ।अलग अलग क्षेत्रो मे एक दूसरे को देख मानव ने अपनी आवश्यकताओं अनुसार इन भाषाओं को विकसित किया। ध्वनी संकेतों और सांकेतिक भाषाओं का इस्तेमाल हम आज भी करते है। इसे एक उदाहरण के द्वारा बताने की कोशिश करता हूं। 
आज भी साधारणतया कोई दूर खड़े या दूर जा चुके शख्स को रोकने के लिए तेज ध्वनि का प्रयोग करते है‌।हम आमतौर पर 'औ,ऐ' की तेज ध्वनि निकालते हैं।वो शख्स जैसे ही ध्वनि की दिशा में देखता है आप उसे हाथ के इशारे से रूकने का संकेत देते हैं।इसी तरह उस समय के मानव के जीवन में भाषा की शुरुआत हुई।                                                                       .......क्रमश      

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