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सौंदर्य की परिभाषा

Neena SethiaNeena Sethia February 4, 2022
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लो फिर बसंत आयी. फिर  से बसंत आयी..
संग संग बहार लायी.. लो फिर बसंत आयी.

पतझड़ को मात दे कर...सब वृक्ष.. खिल रहे हैं....
कोपल का साथ पा कर.... पत्ते.. सिहर रहे हैं...
पत्तों को पा के.... फिर से... डाली भी हँस रहीं हैं..
कलियाँ भी फूल बन के... हर दिन उभर रहीं हैं.

फिर बाग में पपीहा... कूँह-कूँह  सा गूँजता है..
फिर मंजरी से लद कर... हर वृक्ष झूमता है...
मल्हार सी मधुरता... कानों में गुनगुनाई...
लो फिर बसंत आयी... फिर से बसंत आयी.

तितली के झुरमटोँ का... फूलों पे फिर से आना..
मीठी सी सरगमों में... भवरों का  गीत गाना ,
कोयल की कूक सुन कर.. पत्तों का सरसराना...
ऋतुराज  आगमन पे... सब दे रहे बधाई...
लो फिर बसंत आयी.. फिर से बसंत आयी.

फूलों की पंखुड़ी भी ...सतरंगी खिल रहीं हैं...
हर इक कली की देखो... रंगत निखर रही है...
मीठी सुगंध फिर से... बाग़ों में खुशबु लायी
लो फिर बसंत आयी..फिर से बसंत आयी.

सरसों के फूल... जैसे धरती को रंग रहे हैं..
पीताम्बर को ओड़े... खुशियों को भर रहे हैं ,
अम्बर भी मानों... झुक के चुंबित उन्हें है करता...
मिट्टी की सौंधी खुशबू.... हर  सांस में है भरता ,
वन-उपवनों ने मिलकर... आवाज़ है लगाई...
लो फिर बसंत आयी... फिर से बसंत आयी..
खुशियाँ भी साथ लायी.. फिर से बसंत आयी.
                                            नीना सेठिया

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