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"शबनम "... सफ़र जिंदगी का

Neena SethiaNeena Sethia January 29, 2022
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"शबनम"....सफ़र जिंदगी का


आज ओस की बूंदों ने फिर.. मन को प्रफुल्लित...कर दिया..
पत्तों से उतर...न जाने कब..ख़ुद को जमीं के समर्पित कर दिया...

पास खड़ी... देखती रह गयी.. उस अदभुत से दृश्य को,
कुछ ही पलों में बस...अपनी हस्ती को गुम.. कर दिया.

चंद मिनटों के जीवन में...खुशियाँ बिखेरी इस तरह 
कहीं फूलों को...कहीं पत्तों को मखमल...कर दिया.

अपने सौंदर्य पे... ग़ुमा करें, इसका समय कहाँ उनको,
पल में माटी पे गिर... धरा को चुंबित करना है जिनको.

कोई पूछे उनसे... उनके अस्तित्व की गरिमा क्या है?
सूने पत्तों पे.. खुदबखुद गिरने की जरूरत क्या है...??

छोड़ संकोच इक दिन पूछ लिया.. मैंने आकर उनसे....
क्यों मिटा देती हो अपनी हस्ती को... बस यूँही गिर के...

अभी तो जन्मी थीं... आकाश से उतर के आयीं थीं 
अपनी मुस्कान से...इन पत्तों पे फ़िजा लाईं थीं.

कुछ पल तो ठहरतीं...अपनी छवि दिखाने को...
कुछ उदास चेहरों पे... मुस्कान फिर से लाने को.

कुछ लम्हें तो छलकतीं....मोती बन,लम्बी तारों पे...
दो घड़ी और...चमकतीं...बेलों की लम्बी..कतारो पे,
कुछ रुको तो... हाथों से अपने छू... लूँ तुमको..
पल दो पल ही सही..आँखों में अपनी भर लूँ तुमको.

मुस्कायीं... और हंस के बोलीं मुझको तकते तकते...
" ठहरूँगी नहीं.. पर फिर मिलूंगी तुमको चलते चलते,"

"क्योंकि चलना ही मेरी फितरत है...
और माटी में मिलना ही मेरी किस्मत है,
कोई मुस्काता है... दो घड़ी मेरे कारण..
"बस..इसी सोच से बढ़ना मुझे निरंतर है "
"बस... इसी सोच से बढ़ना मुझे निरंतर है."

नीना सेठिया

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