एक शिकायत - ईश्वर से's image
2 min read

एक शिकायत - ईश्वर से

Neena SethiaNeena Sethia February 13, 2022
Share0 Bookmarks 63 Reads1 Likes
" एक शिकायत - ईश्वर से "
 
आज शिकायत की ईश्वर से,
"कैसा  ये उपहास किया...
 हे ईश्वर!.तुमने हम सब से".

स्वयं सुरक्षित नीले नभ में, 
हम को डाला चक्कर में. 
प्रभु हँसे, मुस्का कर बोले...

"दोष मुझे क्यों देते हो?"
"अपने अपराधों की बोलो -- 
"क्या जिम्मेदारी लेते हो?"

सुन कर क्रोधित हो मैं बोली - 
                
"मैंने क्या अपराध किया ?"
"सृष्टि के संचालन का जिम्मा..
  तो सारा..तुम्हें दिया "

मंद मंद मुस्काये ईश्वर और फिर बोले हौले से -
"अपनी जिम्मेदारी मैं तो.. पूरी तरह निभाता हूँ,"

विधिवत सूरज चाँद उगाता,तारे भी बिखरता हूँ. 
क्रम से दिन और रात हैँ आते, जुगनू भी चमकाता हूँ. 
पशु पक्षी भी उड़ते नभ में, मछली जल में तेराता हूँ. 
नदियाँ झरने पर्वत और पत्थर, पेड़ पौधे हवा और बादल, 
सर्दी गर्मी बसंत और पतझड़ सभी काम करता मैं अविरल. 
मैं बोली--
        "बस भी करो अब भगवन!!
         दो विराम निज महिमा को..
         चाँद और सूरज याद तुम्हें
          पर भूले मानव रचना को."

नई नई व्याधि फैलाई, बिन त्रुटियों के सजा सुनाई,
और सारी दुनिया रुकवाई, किसने बुरी नजऱ लगाई. 
ईश्वर बोले---
 "मुझको भी दुख है, चिंता और परेशानी भी..
पर अनगिनत शिकायतें तेरी देतीं है हैरानी.. भी,
"नज़र नहीं पर कर्म बुरे हैं, मानव तेरे इस धरती पे, 
अपने हाथों आप गवाया, जो पाया था..कुदरत से.

जीवन की सुविधा स्वरुप अनमोल रत्न जो पाये हैं, 
अज्ञानी बन कर, बेपरवाही से.. सभी गवाये हैं. 

सुख -संचित ना कर पाये, मीठा फल कैसे पाओगे. 
बोया पेड़ बबूल का तो..फिर आम कहाँ से खाओगे.
 " बोया पेड़ बबूल का.. तो
   फिर आम.. कहाँ से खाओगे"
                        नीना सेठिया
Inspired by a Punjabi Poem.

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts