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    ओ मालिक मेरे......



पल-पल तेरा ही तो साथ लिये जा रहा हूं.....

ओ मालिक मेरे, मौज से जिये जा रहा हूं.....


चलते-चलते जीवन के अनजान सफ़र में.....

हर एक जन में तेरे दर्शन किये जा रहा हूं......


अजीब लूट कर रहे ग़म के चंद लुटेरों को......

दिल से दौलत दुवाओं की दिये जा रहा हूं......


असर नहीं होता अब ज़माने के ज़हर का.....

तेरे नाम की सुधा दिन-रात पीये जा रहा हूं.....


जुदा न कर सके कोई अपनों का साथ यहां.....

चाहत के धागे से रिश्तों को सीये जा रहा हूं.....



- नरेश कुशवाहा



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