ज़िंदगी's image
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जेठ के सूरज तले ठहरी है ज़िंदगी

सुबह न शाम बस दुपहरी है ज़िंदगी


बाज़ के पंजों तले टुकर टुकर ताकती

असहाय बया की तरह सहमी डरी है ज़िंदगी


मेरे लिए तो अब काजल की कोठरी है ये

उनके लिए शायद बहुत सुनहरी है ज़िंदगी


आशा की किरणें ढूंढती अंधी गली में आज सुनती नहीं किसी की शायद बहरी है ज़िंदगी


एकाध हो तो छुटाने की कोशिश कीजिए

आज तो दागों से भरी हुई चुनरी है ज़िंदगी

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