ज़िंदा कौम's image
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ज़िंदा कौम ज़ुल्म का प्रतिकार करती है।

मुर्दा कौम वक्त बीतने का इंतजार करती है।।


एक बनती है तारीख इतिहास में दर्ज़ होकर।

दूसरी दफ़न हो कर बस ख़ाक बनती है ।।


दूसरों का कत्ल जो देखते हैं तमाशाई बनकर।

मौत उनका भी बेरहमी से शिकार करती है।।


हां, गैर है वो जिसका घर जला अभी अभी।

पर देखना अब हवा किस ओर चलती है ।।


अगर बढ़ाया हाथ उसके मुरेठे की तरफ ।

पता नहीं किस किस की पगड़ी उछलती है।।

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