विकास's image
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माना चहुं ओर विकास हुआ है।

पर मानवता का ह्रास हुआ है।।


प्रगति जिसे हमने समझा, उसमें

अवनति का आभास हुआ है ।


कर्मयोगी बना न पाई, उस शिक्षा के

कोरेपन का आभास हुआ है ।


राग द्वेष और छल प्रपंच हो उठा मुखर

सत्य तथा निश्छलता का परिहास हुआ है।


इस राम और कृष्ण की कर्मभूमि में अब

रावण और कंस का सिद्ध प्रवास हुआ है।


छल बल आडंबर को मिला राज सिंहासन

और सत्य को बरसों का बनवास हुआ है।


चकनाचूर भवन के नीचे दबा पड़ा वह

मानव अपनी लोलुपता का ग्रास हुआ है।


तुमने स्वयं बुना था इसका ताना बाना

अब क्यों कहते ये सब अनायास हुआ है।






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