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मुझसे छिपोगी तो मुझे भी कैसे देख पाओगी

मुझे सताने की कोशिश में ख़ुद को तड़पाओगी


मेरी आवाज़ को अनसुना करती हो आज

जब न बोलूंगा तो हर आहट पर जाग जाओगी


रुसवाई के डर से चाहे मुझसे आंखें फेर लो

मगर ख़्वाबों में तुम मुझसे लिपट जाओगी


उठेगा गुबार धुएं का और दूर तक जाएगा

जो कभी तुम मेरे लिखे हुए ख़त जलाओगी

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