कड़वा चौथ's image
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उसने हाथों में मेहंदी सजाई

माथे पर बिंदिया लगाई

रोम रोम पुलकित था उसका

अंग अंग में खुशी समाई


चोटी में फूल लगाया था

उर में आनंद समाया था

पिया मिलन की आस लिए

करवे का थाल सजाया था


आहट होती हल्की सी भी

वो दुल्हन सी शर्मा जाती

पिया द्वार पर आ पहुंचे

सोच,धड़कती थी छाती


वो पल भी आ ही पहुंचा

पिया ने द्वार जब खटकाया

पगलाई सी दौड़ी मिलने को

पर तेज़ गंध का भभका आया


गिरता पड़ता वो आया था

आंखों में नशा समाया था

कहने को था वो अपना

पर लगता बहुत पराया था


देखा भी नही गौर से उसने

उसका हाथ झटक कर बोला

किसके लिए संवर रही थी

इतनी देर में दरवाजा खोला






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