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।। गुल दोपहरी ।।

Mukta Sharma TripathiMukta Sharma Tripathi June 14, 2022
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।। गुल दोपहरी ।।
शाम का समय था। अपने मोबाइल और लेपटाप पर काम करके थकी आँखों को तरोताजा करने के लिए बाहर बालकनी में घूमने लगी। छोटे-छोटे कप-डिब्बों में लगी गुल-दोपहरी जून महीने की कड़ी धूप से मुरझा सी गई थी। सोचा इसे भी तरोताजा कर ही देती हूँ।
जब पानी डाल रही थी तभी हमारे घर के सामने रहने वाली मीना भाभी अपने घर से बाहर निकलीं। माडर्न स्टाइल का कुर्ता-प्लाजो साथ में स्कार्फ पहने बहुत स्टाइलिश लग रही थीं। खुद ही कपड़े सिलती हैं। घर में ही बुटीक खोल लिया है। बढ़िया काम चल रहा है और भाभी की काया कल्प हो रही है।
हाथ हिलाकर दोनों तरफ से अभिवादन का आदान-प्रदान हुआ। वो इतनी स्मार्ट लग रही थीं कि अभिवादन के बाद मुड़ती नज़र, मुड़ते-मुड़ते उनकी तारीफ़ कर गई और भाभी ने नजरों ही नज़रों में तारीफ कबूल कर, अपनी आजाद मुस्कान से धन्यवाद भी कर दिया।
इधर मैं वापिस गुल दोपहरी को निहारने, टटोलने लगी थी कि तभी भाभी की बिटिया स्कूटी निकालते हुए बाहर दिखाई दी। बिटिया अब किसी कॉलेज में लेक्चरार बन गई थी। 
मुझे याद आया कि यह वही बिटिया है जिसके जन्म पर उनके घर में कई दिनों तक मातम और माहौल में क्लेश छाया रहा था। ये क्लेश कुछ दिनों के लिए होता तो और बात थी मगर ये तो बच्ची के बड़े होने के साथ-साथ और बढ़ता गया। पिता का शराब पीना, पीकर भाभी को मारना, गली-मोहल्ले का बचाव करने की विफल कोशिशें। सचमुच कितना भयानक युग देखा था भाभी ने!  
ऐसी परिस्थितियों में माँ बन कर भी वो अपने ही घर में कभी माँ बनने का गौरव प्राप्त न कर सकी। 
जैसे-तैसे पल-पल के संघर्ष के बाद, बातों-चुगलियों के दंश सहकर, बिटिया को पाल-पोस कर बड़ा किया। मगर हमारे समाज में अधिकतर लड़कियों को पालने का समय ही नहीं होता, वो तो स्वतः ही बस बड़ी हो जाती हैं। मानसिक रूप से हम कर देते हैं और शारीरिक रूप से समय।
हमजात दादी की तल्ख नजरों से अपनी बच्ची को बचाने के लिए तथा परिणामस्वरूप अपने रक्त बिदुओं को भाप में उड़ने से बचाने के लिए, भाभी अपनी जिस गुड़िया की उंगली पकड़ कर उसे अंदर की दालान में ले जाती थीं। आज वही गुड़िया स्कूटी पर, कृष्ण की तरह उनकी सारथी बन उन्हें एक नई दुनिया दिखा रही थी।
ये वही माँ थी जिसने अपने हौसले को अपनी नन्हीं परी के आते ही खोखला कर दिया था। मगर आज अदना सी नारी, उनकी बिटिया, अपनी माँ की बेड़ियां तोड़ने में सक्षम हो गई थी। 
स्कूटी स्टार्ट हुई और बिटिया के खुले बाल हवा में झूमते, माँ की छाती से लहरा कर, थपकी देते हुए कह रहे थे, "माँ! ये तो कुछ नहीं अभी तो और उड़ान बाकी है!" 
इस मंद-मंद हवा में, हौसले के बीज उड़ेंगे, दूर-दूर तक जाएंगे और खूब फसल होगी।
इधर पानी पी कर, गुल दोपहरी भी सिक्त हो गई थी अब शायद कल फूल खिल ही जाएं। 
✍मुक्ता शर्मा त्रिपाठी 

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