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गजल - ना बस में है जिन्दगी

Mukesh kumar sahuMukesh kumar sahu April 27, 2022
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ना बस में है ज़िन्दगी 
ना मौत पर काबू है उसका
फिर भी जाने क्यों
खुदा हुए जा रहा है

गुज़रता है जिन गलियों से
जिस गली जिस मोहल्ले से
सुबह की ताजी ख़बर
कोई हादसा हुए जा रहा है..

दिल में छुपा कर रखा था
एक मासूम सा बच्चा जो हमने
देखो ज़माने की भीड़ में
ना चाह कर भी बड़ा हुए जा रहा है

अजीब है ये दुनियां के रंग ढंग
और यहाँ का इंसान
कैद से रिहाई माँग कर
सुकूँ से रिहा हुए जा रहा है..

मिट्टी से पैदा हुआ
मिट्टी का वो खिलौना भी
देखते देखते देखो कैसे
मिट्टी में फ़ना हुए जा रहा है....

ना बस में है ज़िन्दगी 
ना मौत पर काबू ही है उसका
फिर भी जाने क्यों
खुदा हुए जा रहा है

✍✍युवा लेखक
 मुकेश कुमार साहु

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