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आजाद परिन्दे

Mukesh kumar sahuMukesh kumar sahu April 23, 2022
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शुक्रवार का दिन था ।। मै झांसी शहर के सड़कों पे यूहीं बेरोजगारी में टूटा हुआ व्यक्ति की तरह महसूस कर रहा था..... ईलाइट चौराहा के पास लाइट के लगे खंभे के नीचे पानी पूरी के ठेले पे एक लड़का जो कि हमारे ही कॉलेज का था और मुझसे जूनियर (भाई ) था।।बड़े ही प्यार से अपनी साथी G.F के साथ पानी पूरी खा रहा था ।मै उसे रास्ते के उस पार से देखा ,उसके चेहरे पे इस भीड़ भाड़ शहर में किसी के देखने का डर बार बार सताए जा रहा था।एक पल के लिए तो मुझे लगा कि मुझे वहां जाना चाहिए,फिर मेरे आत्मा के अंदर एक कहानी कि रचना होने लगी ,मै सोचने लगा कि मैंने अपनी जीवन में कभी प्यार मोहब्बत जैसी चीजों को महसूस नहीं किया,पर आज मै किसी की मोहब्बत को जीने जा रहा था । मैंने कुछ ही देर पहले ATM से कुछ पैसे निकाले थे।मेरे पास खुल्ले नहीं थे,मै सामने की पुस्तक दुकान से कुछ कलम और पेज का बंडल लिया और जल्दी से दुकान वाले से कुछ खुल्ले पैसे लिए ओर जल्दी से पानी पूरी के ठेले की तरफ बढ़ा । मुझें दोनों मोहब्बत के परिंदे कहीं नजर नहीं आए।मै झट से पानी पूरी वाले के पास गया और पूछा "अंकल,अभी तुरंत दो लोग पानी पूरी खा रहे थे वो किधर गए.?? "अंकल ने मेरा हाव भाव देख के बोला मुझे नहीं पता । मैंने हाथ जोड़ कर फिर कोशिश की अंकल से आखिर में उन्होंने बता ही दिया....... मै जल्दी जलदी चौराहे को पार कर जेल चौराहा की तरफ़ जाने वाले ऑटो के पास पहुंचा मुझे दोनों नजर आ गए।ये दोनों ऑटो वाले से बात कर रहे थे पर ऑटो मै सीट कम थी शायद ।।लड़का लड़की की हाथों में हाथ डाल कर पैदल है अपनी मंजिल को बढ़ा। मुझे एहसास होने लगा कि मोहब्बत भी एक पवित्र आत्मा की तरह होती है।
जो लोगो को किसी भी हद से गुजर जाने का साहस देती है।मै भी पैदल पैदल अपनी कहानी को सजा रहा था।।मेरे अंदर उनको देख कर के कुछ पंक्तियां याद आ रही थी कि:-

"ए सनम तेरा साथ मिले तो मीलो दूर चला जाऊ,
तू मुझे अपनी ओर खीचे मै तुझे अपनी ओर खीचा जाऊ,
किसी और मंजिल की चाह नहीं मुझको ,
झांसी की गलियों में बस गुमनाम हो जाऊ..।।।।"

लगता है ना कभी कभी की प्यार करना और हो जाना दोनों में बहुत अंतर है, हम आप जो सिनेमा में देखते है वो प्यार जिसमें दिखलाया जाता है कि अमीर लड़की और गरीब लड़का कैसे इस दुनिया में संघर्ष करते है और अंत में उन्हें मार दिया जाता है वगैरह वगैरह...........
इन्हीं सब बातों को सोचते हुए हम सदर बाज़ार पहुंच चुके थे।। रास्ते में कभी किसी बात को लेकर दोनों का हसना,पत्थरों को लात मारना,धीरे धीरे हाथों से लड़की द्वारा लड़के को मारना ,इन्हीं सब चीजों के साथ वो दोनों एक रेसटोरेंट के पास रुके। मै दूर खड़े एक कार की आड़ में छुप गया।लड़का लड़की दोनों ने इधर उधर देखा कि कहीं कोई हमें तो नहीं देख रहा है, मतलब ऐसा लग रहा था मानो ऐन्टी रोमियो और बजरंग दल वाले अभी आएंगे ओर उन्हें पकड़ लेंगे ......
दोनों ने रेसटोरेंट् में प्रवेश की और ऐसे जगह की तालाश किए जो उनके लिए संतुलित हो।दोनों ने एक दूसरे की सहमति से कुछ ऑर्डर किए ओर खाना आने का इंतज़ार करने लगे.....लगभग 15-20 मिनट बाद एक व्यक्ति खाने से भरी प्लेट ले कर आया और टेबल पर रख दिया ।
मै भी रेस्टोरेंट में ऐसे जगह को चुना था जहां से वो मुझे नहीं देख सकते थे पर मै उन्हें अच्छे तरह से देख पा रहा था।वे लोग क्या बात कर रहे थे इसका आईडिया तो मुझे नहीं था पर इतना तय है कि दोनों एक दूसरे से बड़ी रूहानियत से पेश आ रहे थे।
वहां एक अजीब सा माहौल था ,दोनों की मन में एक बेचैनी,घबराहट,डर और एक सुकून था। इन सारी चीजों को देखकर मेरे अंदर जो प्यार का मतलब भरा पड़ा था ये उनसे काफी अलग था.....
ये जो नज़र है ना हमारी जिसे हम नजरिया कहते है ये लोगों में अलग अलग होती है।। शायद ये जो प्यार मोहब्ब्त के खिलाफ वाले संगठन या गैंग है उन्हें अपना नजरिया और सोच बदलना चाहिए।
इन मोहब्बत के परिंदो को भी जगह (स्पेस ) मिलना चाहिए ।। मुझे तो नहीं लगता की 
प्यार के बिना समाज और संसार में बदलाव लाया जा सकता है।
मैं ये सब सोच ही रहा था तो मेरी नजर लड़की पर पड़ी वो अपने हाथों से लड़के को खाना खिला रही थी,उसे भी पता था कि कहीं चार साल के बाद शायद एक दूसरे से ना मिल पाए, दोनों के बीच अपनापन सा व्यवहार था। बिल्कुल पास बैठी लड़की के हाथ पकड़कर लड़का कुछ वादें भी कर रहा था।। लड़की के आंखों में आंसू भी थे ,चेहरे पर भारीपन भी दिख रहा था।। अचानक लड़के की मोबाइल बजती है वो लड़की से आवाज नहीं करने का इशारा करता है कुछ बात करता है मोबाइल में,और हाथ में बंधी घड़ी को देखता है शायद समय अब लौटने का इशारा कर रहीं थीं। वही भीड़-भाड़ सड़कें, वही औटों के शोर,,सूरज की हल्की रौशनी, साफ बादल और पूर्वी हवाएं मानो बाहें फैलाए खड़ी है अब शायद मेरी आखों में इनकी धुंधली तस्वीर दिखाई दे रही है। 

नफरत भरी निगाहों से देखते इन्हीं लोगों के बीच आज इन परिन्दों को मै बिना किसी डर और संकोच के मेरे कलमों द्वारा आजाद कर दिया।

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