सूर्यपुत्र कर्ण की कहानी 

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सूर्यपुत्र कर्ण की कहानी  सूर्यपुत्र कर्ण की कहानी

मृणाल सिंह (उत्तम)❤मृणाल सिंह (उत्तम)❤ October 8, 2022
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कर्ण महाभारत के वीर योद्धाओं में से एक हैं। जिनकी छवि वर्तमान में एक शूरवीर और दानी के रूप में प्रतिस्थापित है। विभिन्न मान्यताओं के अनुसार उनका जन्म “कुंती” (श्रीकृष्ण के पिता वासुदेव की बहन और भगवान कृष्ण की बुआ) के घर एक वरदान के रूप में हुआ था। एक दिन दुर्वासा ऋषि चहल-पहल करते हुए, कुंती के महल में आए। उस समय कुंती अविवाहित थी, तब कुंती ने पूरे एक वर्ष तक दुर्वासा ऋषि की सेवा की थी। सेवाभाव के दौरान दुर्वासा ऋषि ने कुंती के भविष्य को अंतर्मन से देखा और कुंती से कहने लगे “तुम्हे राजा पाण्डु से कोई संतान प्राप्त नहीं होगी, इसके लिए तुम्हे मैं एक वरदान देता हूँ कि तुम किसी भी देवता का स्मरण कर उससे संतान प्राप्त कर सकती हो।” इतने कहने के बाद, दुर्वासा ऋषि वहां से चले गए, तभी उत्सुकतापूर्वक कुंती ने सूर्य देव का ध्यान लगाना शुरू किया। वह प्रतिदिन सूर्यदेव की पूजा अर्चना करने लगी, उनके भक्तिभाव से प्रसन्न होकर सूर्य देव प्रकट हुए और उन्होंने कुंती को एक पुत्र का वरदान दिया। जिसके कुछ समय बाद कुंती ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसमें सूर्य का तेज झलकता था और यही-नहीं जन्म से ही कर्ण के शरीर पर कवच और कुण्डल थे।किशोरावस्था से ही कर्ण युद्ध कला में पारंगत थे। वह अपने पिता की भांति रथ की जगह युद्ध कला में अधिक रूचि रखते थे। एक दिन उनके पिता अधिरथ उन्हें गुरु द्रोणाचार्य के पास ले गए, जो उस समय के सर्वश्रेष्ठ वीर योद्धाओं में से एक थे। गुरु द्रोण सिर्फ कुरु वंश के राजकुमारों को ही शिक्षा देते थे। जिसके चलते उन्होंने सूद पुत्र कर्ण को शिक्षा देने से इंकार कर दिया, क्योंकि कर्ण एक सारथी का पुत्र था और द्रोण क्षत्रियों को ही शिक्षा देते थे। उसके बाद युद्ध कला को सीखने के लिए वह परशुराम से मिले, जो केवल ब्राह्मणों को ही शिक्षा देते थे। यह जानकर कर्ण ने स्वयं को एक ब्राह्मण बताया और शिक्षा प्राप्त की। जिसके चलते वह युद्धकला और धनुर्विद्या में निपुण हुए।अविवाहित होने कारण लोक-लाज से बचने के लिए कुंती ने अपने पुत्र को एक टोकरी में रखकर गंगा नदी में बहा दिया था। अविवाहित होने कारण लोक-लाज से बचने के लिए कुंती ने अपने पुत्र को एक टोकरी में रखकर गंगा नदी में बहा दिया। जहां कुछ ही मीलों दूर महाराज धृतराष्ट्र का सारथी अधिरथ और उनकी पत्नी राधा नदी किनारे कपड़े धो रहे थे। उसी समय उन्होंने एक टोकरी को बहते देखा और नदी से बाहर ले आए। जहां उन्होंने देखा एक नन्हा-सा बालक रो रहा है, जिसे देख दंपति जोड़ा काफी खुश हुआ और उन्होंने उसे गोद लेने का निर्णय किया। जिसके चलते उनका नाम वासुसेन रखा गया।उन्होंने अपने पिता की इच्छा को पूर्ण करते हुए रुषाली नामक एक सूद पुत्री से विवाह किया। इसके बाद कर्ण ने एक और व‌िवाह क‌िया ज‌िसका नाम था सुप्र‌िया। इन दोनों पत्न‌ियों से कर्ण को नौ पुत्र प्राप्त हुए। उनके नौ पुत्रों ने महाभारत के युद्ध में प्रतिभाग लिया। जिसमें वृशसेन अर्जुन के हाथों से वीरगति को प्राप्त हुए थे। वृशकेतु एकमात्र ऐसा पुत्र था जो जीवित था। युद्ध के दौरान कर्ण की मृत्यु के पश्चात् रुषाली भी कर्ण की चिता पर ही सती हो गई थी।सूद पुत्र कर्ण एक उदारवादी और दानवीर योद्धा थे। जिसके चलते वह नित्यकर्म सूर्य भगवान की पूजा अर्चना करते थे। आस्था के प्रति विश्वास रखते हुए कर्ण धर्म के प्रत्येक कर्मकांडों को करते थे। उनकी वीरता के किस्से आज भी विभिन्न पुराणों में विद्यमान है। अंगराज का राजा बनने के पश्चात् कर्ण सूर्य देव की उपासना के बाद दान करते थे। उन्होंने अपनी माता को यह वचन दिया कि महायुद्ध के दौरान वह अर्जुन के अतिरिक्त और किसी पाण्डव का वध नहीं करूंगा। जिसके चलते उन्होंने अर्जुन के वध के लिए देवराज इंद्र से इंद्रास्त्र भी माँगा था।पुराणों के अनुसार, जब गुरु द्रोण ने हस्तिनापुर में युद्ध पराक्रम की एक प्रतियोगिता का आयोजन करवाया, तब उस प्रतियोगिता में अर्जुन को विशेष धनुर्धारी के रूप में सम्मानित किया गया। उसी समय वहां कर्ण आ जाते हैं और वह अर्जुन के द्वारा किए गए युद्ध कौशलों को भली प्रकार से कर लेते हैं और अर्जुन को दवंदयुद्ध के लिए ललकारते हैं। तभी सभा में उपस्थित कृपाचार्य कर्ण के हस्तक्षेप को निरस्त करते हुए उनसे वंश और साम्राज्य के बारे में पूछते हैं – क्योंकि दवंदयुद्ध के अनुसार एक राजा ही एक राजकुमार को ललकार सकता है, उसी समय कौरवों में दुर्योधन ने जाना कि एक कर्ण ही एक योद्धा है जो अर्जुन को मात दे सकता है। इसलिए दुर्योधन कर्ण को अंगदेश का राजा घोषित करते है ताकि कर्ण दवंदयुद्ध के योग्य हो जाए। उसके बाद कर्ण ने दुर्योधन से पूछा की तुम्हे इसके बदले क्या चाहिए, दुर्योधन ने जवाब दिया मुझे तुम्हारी दोस्ती चाहिए। जिसके चलते दोनों एक एक दूसरे के घनिष्ट मित्र बन गए।



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