मेरी हकीकतें's image
Poetry1 min read

मेरी हकीकतें

AnkurAnkur February 19, 2022
Share0 Bookmarks 85 Reads0 Likes

अपने अश्कों का खरीदार भी में ही हूँ 

कम्भख्त किसी और का दामन भिगातें ही नहीं !!


नसीब खेल ही तो रहा है साहब 

किसी के हिस्से रोटी और किसी के भूक ही आती है !!


फर्क बस इतना है साहब

आपसे दुनिया थी और अब आप भी दुनिया में हो !!


साल हुआ फिर दो हुए फिर कई हुयें 

 ज़ख्म कुछ वक़्त ने भर दिए ,

कुछ नासूर ही रहे !!


बेचैनी से जागती आँखों से कोई अमीर न सोता नौबतन इस मर्ज़ का इलाज भी पैसा होता !!




No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts