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वर्षा की बूंदें करती है अठखेलियां,

इनसे निकलती है स्वरलहरियां

धरती पर मिलकर बनती जलधारा,

इठलाती बलखाती चलती मिलने सहेलियां।


नदियों से मिलने को आतुर जलधारा ,

इनसे मिलकर बन जाती अमृधारा,

अपने अस्तित्व को मिटाने की धुन में,

ये भी बन जाती पावन गंगा की धारा।

ए नन्ही बूंदें खुद समर्पण कर,

पावन गंगा बनकर पूजी जाती है,


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