लघुकथा's image
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भगवान दुःख में सबकी मदद करते हैं

माधुरी अपने घर के कैम्पस में बैठी धारों धार रो रही थी,

उसको सहारा देने वाला या मन की तकलीफ़ समझने वाला

कोई नही था ,

तीन सास ससुर की इकलौती बहू थी ,उनको एक ढाई साल की बच्ची थी बच्चे के इंतजार में परिवार पति सब लोग निराश हो गये थे निराशा में ही माधुरी को ताना देना,बेटे की दूसरी शादी करने लेगे ऐसे ही प्रताड़ित करने लगे।

क्यों कि अब बच्चा नहीं होगा कुल डूब जाएगा।

माधुरी बहुत दुःखी थी जून का महीना था माधुरी बेचैनी मे

इधर उधर टहलने लगी ।

उसी समय एक सांवला रंग शरीर हड्डी का ढांचा पूरा शरीर

तेल से नहाए माधुरी के पास आए बेटी घबराओ मत भगवान

सबकी सुनते है।

मै प्रयाग जा रहा हूं मुझे इक्कीस रुपए देदो माधरी बोली बाबा

और ले लो इतने कम पैसे में कैसे पहुंचोगे बाबा बोले कम नहीं है, बेटी मुझे एक गिलास पानी पिला दो ,

बाबा पानी पीकर जाने लगे तो एट चांदी का सिक्का दिए और

बोले बेटी रोज सुबह नहाकर एक गिलास पानी में सिक्के को

धोकर पीते रहना माधुरी रोज ऐसा ही करने लगी नव महीने

के बाद एक नन्हे बालक का जन्म हुआ सब लोग खुशी

मनाने लगे।



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