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खामोशी

मेरी खामोशियां ही ,

मेरी दुश्मन की तरह

सवाल बन गया खुद से,

दुशमन की तरह,

बड़ा नाज था खुद पर,

अपनी होशियारी पर,

मगर वेआवरू बन बैठे,

अपनी वफादारी पर,

जिन्हें नाज़ था हम पर,

हमारी कामयाबी पर,

वही बदनाम करते हैं,

नाकामी पर,

वक्त का फेर है ऐसा,

जो मतलब बदल देता है,

खुशी मिल नही पायी,

गम की परछाई पर।

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