बेटी की जिंदगी's image
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बेटी के एक चुटकी सिंदूर से,

बट जाता है दो भागों में उनका संसार,

मां बाप ने जन्म दिया कितने नाजों से पाला,

मजबूर होकर भेजना पड़ता है दूसरे के घर द्वार,

बेटी पड़ती है दुविधा मे किसको कहूं मै अपना,

किसको समझूं पराया,

दोनों जगह से मुझे नाम मिला पराया।

बेटी के हाथ बंधा कच्चे धागे की डोरी,

कभी नहीं फिसलती कच्चे धागे की डोरी,

पति के हाथ बंधे रेशम की डोरी,

पल भर में फिसले रेशम की डोरी,

फिसलते हुए को भी बेटी ही संभाले रेशम की डोरी,

सब अत्याचारों को सहते-सहते और बलजोरी में,

जिंदगी की परीक्षा देते-देते एक दिन,

एक दिन कट जाती है जीवन की डोरी।




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