हम आदिवासी जंगल को खूब समझते हैं's image
Love PoetryPoetry1 min read

हम आदिवासी जंगल को खूब समझते हैं

मारूफ आलममारूफ आलम November 14, 2021
Share0 Bookmarks 13 Reads0 Likes

तेरे पैंतरे को तेरे दंगल को खूब समझते हैं

हम आदिवासी जंगल को खूब समझते हैं


हाकिम हमें ग्रहों की चाल मे मत उलझा

हम,सूरज,चांद,मंगल को खूब समझते हैं


उससे कहो बीहड़ की कहानियाँ न सुनाए 

चम्बल के लोग चम्बल को खूब समझते हैं


इन्होंने सर्दियाँ गुजारी हैं नंगे बदन रहकर

ये गरीब लोग कम्बल को खूब समझते हैं


जो बच्चे गाँव की आबोहवा मे पले बढ़े हैं

वो नदिया,पोखर,जंगल को खूब समझते हैं

मारूफ आलम






 













No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts