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कयामत नहीं
तबाही मचा दूँ
जीवन हूँ मैं
फूल खिलाता हूँ

तोहमत नहीं 
बेकुसूर को सताऊँ
न्याय हूँ मैं
रिहाई देता हूँ ।

   मं शर्मा (रज़ा)

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