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खाक हूँ 
मैं खाक हूँ
तेरी नज़र में
राख हूँ 

मेरा भी
एक वजूद है
मुझमें भी 
गुरूर है 

पाँवों में हूँ अभी
छेड़ना न मुझे कभी 
उड़ कर सर पे तेरे
वर्ना चढ़ जाऊँगी।

    मं शर्मा( रज़ा)

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