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पंछियों की उड़ान सा

गगन का विस्तार नहीं

लहरों की हलचल सा

नदी का व्यवहार नहीं


सबकी अपनी मर्यादा है

सबका अपना औचित्य है

निरूद्देश्य यहाँ कुछ नहीं

हर बात में उद्देश्य निहित है।


मं शर्मा (रज़ा)

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