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शर्म ओ हया ओढ़ी मैंने

एक आभूषण की तरह

सदियों से ही मैंने माना

लाज शर्म मेरा गहना है


पुरूषों को भी याद रहे

सदा नारी सम्मान करना

हयावान नारी को कभी

हैवान होने पे मजबूर न करना।


मं शर्मा (रज़ा)


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