सैलाब's image
Share0 Bookmarks 14 Reads1 Likes

जीना शौक था

अब मजबूरी है

मैं तब और था

आज बात दूसरी है


आँखों में सैलाब

समेटे रहता हूँ

डूबने को कोई और

समुंदर गैरजरूरी है।

मं शर्मा (रज़ा)

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts