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छंट रहे हैं मन के अंधेरे छंट जाने दे

बिखरते हैं रंग गुलाल के बिखर जाने दे

फैलती है खुशबू प्यार की तो अच्छा है

बाकी कहाँ मुहब्बत का चलन ज़माने में।


मं शर्मा (रज़ा)

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