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झूठ और फरेब का

बाज़ार सज रहा है

क्यों ना ज़मीर बेच कर

फरेब खरीद लें


कहाँ कोई यूँ भी

जीने दे रहा है

क्यों न खुदी को मार

जीना सीख लें ।


मं शर्मा(रज़ा)

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