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स्पर्श के अहसास को

खामोशी की आवाज़ को

गुजरते हुए दिन रात को

समझ सका है कौन


भूली बिसरी याद को

पंछी की परवाज़ को

सपनों की उड़ान को

बाँध सका है कौन ।


मं शर्मा (रज़ा)

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