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नवकल्पना नवरूप से

उसने रचा संसार है

सृष्टि की हर रचना में

प्राणों का संचार है


किस बात का घमंड है

क्यों इतना मगरूर है

सॄष्टि का आधार मैं हूँ

शेष सब निराधार है ।


मं शर्मा (रज़ा)

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