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दिन महीने साल बीते

नदी झरने नाले रीते

मुरली की धुन को तरसे

तुम ओझल क्यों हुए ऐसे 


मौसम आए चले गए 

ग्वाल बाल सब खीझ गए 

कल की कह गए कान्हा

तुम अजहुँ नहीं आए।


मं शर्मा( रज़ा)

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