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राह निहारूँ

हाथ पसारूँ

प्रतिदिन सुमिरूँ

कब आओगे

मैं धीरज हारूँ


पंथ बुहारूँ

नयन बिछाऊँ

निसदिन ध्याऊँ

कब आओगे

मैं जीवन वारूँ।


मं शर्मा( रज़ा)

#स्वरचित



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